मेरा निजी आकलन है, यह समय साहित्य सृजन-वाचन-पठन के दृष्टिकोण से सूखे का दौर है। आजकल कौन लिखता है कहानियां और कविताएं ? तो ऐसे समय में अगर कोई ऐसी कविता पढ़ने को मिल जाए जिसमें न सिर्फ बेहद प्यारे शब्द हों, बल्कि आज की दुनिया में मरती संवेदनाओं के बीच आंखे खोलनेवाली हो तो क्या कहेंगे आप ? इस कविता को खासकर आज के अभिभावकों और शिक्षकों को जरूर पढ़ना चाहिए। यह कविता है श्रीमती मौसमी घोष की. वे रांची में रहती हैं और हैप्पी डेज स्कूल की प्राचार्य हैं। जरा इन पंक्तियों पर नजर डालें-

मैं बना
टीचर ने कहा था
ईक निबंध लिखो,
क्या बनना चाहते हो
बड़े होकर.
मैंने पूछा
क्या लिखूँ?
टीचर ने कहा
लिखो ,
डाक्टर, इंजिनियर या
टीचर बनना चाहता हूं!
मन ने कहा
क्यूँ लिखूँ?
मैं तो यह सब बनना
चाहता ही नहीं!
टीचर ने पूछा
फिर क्या बनोगे तुम?
मैं ने भी पूछा मन से
फिर क्या बनोगे तुम?
मन ने कहा,
मैं धूप बनूंगा,
छांव बनूंगा,
बादल औ’ बारिश बनूंगा!
नन्हा सा एक बीज बनूंगा!
या फिर मैं एक पेड़ बनूंगा,
फूलदार, फलदार
छायादार, हवादार!
या नन्ही सी चिरैया का
आकाश बनूंगा!
मुझे भर देगी वह
उड़ उड़ कर,
गा गा कर!
टीचर अवाक!
मैं निर्वाक!
मेरा बावरा मन कुछ ऐसा ही है!
कुछ भी सोच- बोल बैठता है!
दिन बीते बहुतेरे.
टीचर के अनेकों छात्र
बन गए
डाक्टर, इंजीनियर, टीचर.
मुझे भी बनना था,
धूप, छांव, बादल, बारिश
और जाने क्या क्या कुछ,
जो मै बन नहीं पाया!
पर हां,
मैं बना खाद!
अब मुझसे होकर
कितने वो पेड़ उग रहे,
बादल, बारिश, घूप छांव का
जमघट जम रहा.
चिड़ियों का मेला लग रहा.
सूनी सूनी धरती
औ’
खाली खाली अंबर
मुखरित हो रहे !
क्या कहा?
मुझे तुम पहचानते नहीं?
न सही!
मेरा नन्हा सा बीज जानता है मुझे !
पेड़ पहचानता है मुझे!
मैं जानता हूँ मुझे !
कि मैं एक कामयाब
खाद बना.
जिसमें तामिर हुआ
हर ख्वाब !