RANCHI :
पहली नजर में यह पहाड़ काफी मनोरम लगता है. मीलों तक फैले इस पहाड़ में ऊंचे- नीचे ढलानों की कई ऋंखलाएं हैं. इस पहाड़ की चोटियों का अधिकांश हिस्सा घने जंगलों से ढंका है. इस पहाड़ पर दर्जनों छिपी हुई अंधेरी गुफाएं हैं. ऐसा स्थान जिसमें पर्यटन के लिहाज से काफी संभावनाओं से भरा है. इसका प्राकृतिक सौंदर्य अभी भी अछूता है.

यहां साल, महुआ, बेर, आंवला सहित विभिन्न प्रजातियों के वृक्ष, वनस्पतियां, लताएं हैं-जो पहाड़ को मनोरम और खतरनाक दोनों ही बनाती है. इतना ही नहीं विभिन्न प्रकार के जीवों का भी यह आश्रयस्थल है. जी हां हम बात कर रहे हैं बूढा पहाड़ की. कभी झारखंड में नक्सलियों के सबसे बड़े गढ़ रहे बूढा पहाड़ की.
झारखंड से लेकर छत्तीसगढ़ तक फैला है बूढ़ा पहाड़
पलामू, लातेहार और गढ़वा की सीमा पर फैले बूढ़ा पहाड़ का कुछ हिस्सा छत्तीसगढ़ की सीमा से भी लगता है. मंडल डैम के एक छोर से सटे इसका कुछ हिस्सा ब्याघ्र परियोजना के तहत भी आता है. रांची से तकरीबन डेढ़ सौ किलोमीटर दूर इस दुर्गम इलाके में इस पहाड़ का जिक्र झारखंड में माओवादियों के सबसे बड़े आश्रयस्थली या मुख्यालय के रूप में होता आया है.
सालों तक अपने वारदातों को अंजाम देने के बाद नक्सली बूढ़ा पहाड़ में छुप जाया करते थे जहां वे खुद को महफूज पाते थें. पहाड़ में जहां तहां लैंडमाइंस बिछे थे और छिपने की दर्जनों गुप्त जगह, जहां तक, पुलिस और पारा मिलिट्री फोर्स नहीं पहुंच पाती थी. ईनामी नक्सली सुधाकरण जैसे लोग यहां रणनीति बनाते थें. यहां पर नक्सलियों का प्रशिक्षण स्थल था. वे यहां बैठक करते थें. अपने हथियार छुपाकर रखते थें. पर जब सुरक्षा बलों ने नक्सलियों को उनके ही मांद में घेरना शुरू किया तो नक्सलियों के पैर उखड़ने लगे.
ऑपरेशन ऑक्टोपस के तहत मांद में ही घेरा गया नक्सलियों को
बूढा पहाड़ में पुलिस और सुरक्षाबलों का ऑपरेशन लंबे समय से चल रहा था. पर ऑपरेशन ऑक्टोपस के तहत नक्सलियों को सुनियोजित तरीके से उनके ही मांद में घेरने की मुहिम शुरू हुई. पहाड़ के चारों तरफ घेराबंदी की गई. नक्सलियों की सप्लाई लाइन काटी गई. उनकी फंडिंग पर अंकुश लगाया गया. पहाड़ के चारों तरफ पिकेट बनाया गया. इसके बाद नक्सलियों की हालत वैसी ही हो गई जैसे पिंजरे में चूहे की होती है.
अपनी रणनीति से पुलिस और सुरक्षाबलों ने मनोवैज्ञानिक लड़ाई में नक्सलियों पर बढ़त बना ली थी. सरकार की सरेंडर पॉलिसी का भी असर पड़ रहा था. फिर धीरे धीरे मुठभेड़ों में नक्सलियों की कमर तोड़ा जाता रहा. लगातार शिकंजा कसते जाने और अभियान की वजह से नक्सलियों के पास कोई चारा न रहा. या तो वे मुठभेड़ में मारे जाते या फिर पहाड़ में ही बिना सप्लाई भूखे प्यासे मर जाते.
मुख्यमंत्री ने तिरंगा फहरा आजाद किया बूढ़ा पहाड़ को
हताशा में कई माओवादी किसी तरह भागने में सफल रहे वहीं जो बच गए उनके पास सरेंडर करने के अलावा कोई और चारा नहीं रहा.
लगभग तीन दशक तक आतंक का पर्याय बने रहने के बाद बूढ़ा पहाड़ पर तिरंगा लहराया गया. मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन खुद पहाड़ पर पहुंचे और यह संदेश देने की कोशिश की अब बूढा पहाड़ आतंक के काले साये से आजाद हो गया है.