गंगा जमुनी तहजीब की पंरपरा के वाहक थे बदरुद्दीन तैयब

गंगा जमुनी तहजीब की पंरपरा के वाहक थे बदरुद्दीन तैयब

हिन्दू-मुस्लिम् की बहुल एकता ने फूट डालो और राज करो नीति को सदा ख़ारिज किया

भारत में विदेशी राज्य की स्थापना हिंदू मुस्लिम के बीच खाई के आधार पर हुई। अंग्रेजों के इस देश में कदम रखने से पूर्व हिंदू और मुसलमानो के बीच कोई मतभेद नहीं था। दोनों प्रेम और बंधुत्व की भावना के साथ एक दूसरे से मिलते थे परंतु अंग्रेजों ने इस देश में व्यवसाय के नाम पर एक षड्यंत्र रचा। उन्होने  हिंदुओं के बीच यह दुष्प्रचार फैलाया की मुसलमान ने अपने शासनकाल में हिंदुओं पर बहुत अत्याचार किए। मंदिरों को तोड़ा और यहां की संपत्ति को लूटा । जबकि मुस्लिम शासक के समय भी देश में हिन्दुओं की जनसंख्या मुसलमानो से अधिक थी। इस तरह के प्रचार से नफरत की भावनाओं का उभरना स्वाभाविक था लिहाजा हिंदू और मुसलमानों के बीच धार्मिक मामलों को लेकर परस्पर कटुता बढ़ती गई। फिर स्थिति इतनी नाजुक हो गई की छोटी-छोटी बातों पर संप्रदाय तनाव शुरू हो गया और दंगों का सिलसिला जारी हो गया।

 सबसे पहले हिंदू मुस्लिम दंगा 1809 में बनारस में हुआ फिर 1886 में इटावा और दिल्ली में भयानक दंगे हुए अंग्रेजों के दौर में होने वाले दंगे का मूल उद्देश ब्रिटिश शासन का स्थायित्व कायम करना था। इस भयावह स्थिति से निपटने के लिए हिंदू और मुसलमानों की ओर् से सामाजिक कार्यकर्ता,बुद्धिजीवी मंच और धार्मिक अगुवा दोनों ओर से लोगों को जोड़ने का प्रयास किया।

ऐसे ही लोगों में एक नाम बदरुद्दीन तैयब का है जो मुंबई में रहते थे और बोहरा संप्रदाय से संबंध रखने वाले एक धनाढय व्यापारी थे।  इनका व्यापार देश-विदेश मे था और इनका अधिकत्तर व्यापार हिंदू व्यापारियों के साथ था। यही कारण है इन दोनों समुदाय के व्यापारियों में कोई नफरत की भावना नहीं थी। इन व्यापारियों को एक दूसरे से मिलकर रहने में कोई आपत्ति नहीं थी। बदरुद्दीन तैयब सदा अपने भाषण में कहा करते थे की हिंदू और मुसलमान इस धरती के लाल हैं। दोनों को सार्वजनिक समस्याओं के लिए संयुक्त रूप से मिलकर प्रयास करने की आवश्यकता है। बदरुद्दीन तैयब उच्च कोटि के धार्मिक विद्वान थे।

 वे संप्रदायिक संकीर्णता से पूरी तरह मुक्त थे।अपनी विशाल हृदयता के कारण वह सभी में लोकप्रिय थे।उन्हें इस बात का पूरा विश्वास था कि भारत  के भविष्य की सफलता इसी बात पर निर्भर है की दोनों कौम् संयुक्त उद्देश्य की प्राप्ति के लिए परस्पर एक दूसरे का सहयोग करें। उनका यह प्रयास सफल रहा। और हिन्दू मुस्लिम एकता की दीवार की नीव मज़बूत बनी। आज भी कुछ सिरफिरे हैं जो इस एकता को तोड़ने की कोशिश में है पर वे असफल हैँ।

प्रस्तुति-महबूब् आलम् सामाजिक कार्यकर्ता

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