
रूपाली दास, छात्रा, मास कम्युनिकेशन, गोस्सनर कॉलेज
रंगों का त्योहार होली आने वाला है. चारों ओर इसे लेकर ज़ोर-शोर से तैयारियां चल रही है. दुकानें सज गई है और बाज़ार गुलजार है. विभिन्न समुदायों में इसे लेकर अलग-अलग मान्यताएं हैं, जो जुदा होते हुए भी खुशियों और जीवन के संगीत को गुलजार करने वाला है. झारखंड जनजाति बहुल राज्य है. यहां कुल 32 जनजाति समुदाय हैं और सभी का होली मनाने का तरीका कुछ अलग है. इनमें उरांव जनजातीय समाज की संख्या संथाल के बाद दूसरे स्थान पर राज्य में सबसे ज़्यादा है. उरांव (कुड़ुख) समाज में भी होली प्रचलित पर्व है, इस समुदाय के लोग होली को ‘फगु पर्व’ कहते हैं.
प्रचलित है सोनो और रूपो गिद्ध की दंत कथा
उरांव समाज की पौराणिक कथा के अनुसार-बहुत पुराने समय में एक ऊंचा पहाड़ (सारू पहाड़) था जिसपर सेमल का विशाल पेड़ था. इस पेड़ पर सोनो और रूपो नाम के दो गिद्ध रहते थे. दोनों ही राक्षसी स्वभाव के थे, वे छोटे-छोटे बच्चों को अपना आहार बनाते थे. उनके कहर से परेशान लोगों ने अपनी जान बचाने के लिए धर्मेश (ईश्वर) से प्रार्थना की. भगवान ने उनकी प्रार्थना स्वीकार की और गिद्धों को मारने के लिए लोहार से 12 मन का धनुष और 9 मन का तीर बनाने के लिए कहा. इसके बाद फागुन पूर्णिमा के दिन भगवान ने घोंसले में बैठे हुए दोनों गिद्ध को मार कर लोगों को भय मुक्त कर दिया. उसी दिन से फग्गू चंदो अर्थात् फागुन पूर्णिमा के दिन होली का त्योहार मनाया जाने लगा.
फगुआ काटने की है मान्यता
पौराणिक मान्यता के अनुसार होली अर्थात् फागुन पूर्णिमा के एक दिन पूर्व फगुआ काट कर उसे आग में जलाने की परंपरा है. फगुआ काटने से यहां तात्पर्य सेमल की डाली काटने से है. कथा के अनुसार सोनो – रूपो की मौत के बाद उस सेमल पेड़ को भी पुआल लगाकर जला दिया गया था जिस पर गिद्धों का निवास था, ताकि फिर से कोई गिद्ध इस पर घोंसला न बना सके.
गीत,नृत्य और पारंपरिक पकवान की होती है धूम
त्योहार का वातावरण हो और नृत्य न हो तो त्योहार अधूरा लगता है. उरांव समाज में होली बहुत ही धूमधाम से मनाई जाती है. इस दिन घर में पारंपरिक पकवान जैसे ठेकुआ और अरसा बनाते हैं. सोनो गिद्धी रूपो गिद्धी गई रूपेनु….. जैसे गीतों को सुनकर होली का एक अनोखा रंग देखने को मिलता है.
होली मनाने में आया बदलाव
समय के साथ सब कुछ बदलता है. इसी तरह उरांव समाज में भी समय के साथ होली खेलने के तरीके में बदलाव आया है. पहले लाल और पीली रंगों की मिट्टी से बनाये रंगों से होली खेली जाती थी. अब वे बाजार में मिलनेवाले रंगों का इस्तेमाल करते हैं.
उरांव समाज में होली की पूर्व संध्या पर फगुआ काटने, जलाने और खुशियां मनाने की परंपरा है-प्रो हेमंत टोप्पो, कुड़ुख विभाग, गोस्सनर कॉलेज.