रांची में सरना धर्म कोड महारैली : ‍वक्ताओं ने कहा धर्म कोड हासिल करने तक आंदोलन जारी रहेगा

कॉमन सिविल कोड एवं हिंदू राष्ट्र की अवधारणा का भी हुआ विरोध

रांची में सरना धर्म कोड महारैली : ‍वक्ताओं ने कहा धर्म कोड हासिल करने तक आंदोलन जारी रहेगा

रांची.

राष्ट्रीय आदिवासी समाज सरना धर्म रक्षा अभियान के तत्वावधान में रांची के मोरहाबादी मैदान में सरना धर्म कोड महारैली का आयोजन हुआ. महारैली में झारखंड के विभिन्न जिलों सहित ओडिशा, पश्चिम बंगाल, छतीसगढ, बिहार के अलावा नेपाल व भुटान से भी भारी संख्या में लोग शामिल हुए.

अभियान की ओर से कहा गया है कि महारैली के माध्यम से भारत सरकार तथा संबंधित राज्य सरकारों को संदेश पहुँचाया जा रहा है कि सरना धर्म कोड का मुद्दा अब राष्ट्रीय स्तर पर ऊभर चुका है.

यह दुर्भाग्य है कि आदिवासियों के संवैधानिक वैधानिक एवं प्राकृतिक अधिकारों पर भी अब भी अतिक्रमण होते आया है. संविधान में आदिवासियों के लिए कई प्रावधानों के होते हुए भी अबतक धरातल में लागू नही हो पाया है. आजादी के 75 वें वर्ष में हम अमृत महोत्सव मना रहे है लेकिन देश के आदिवासियों की चिंता किसी को नही है.

जारी रहेगा आंदोलन : बंधन तिग्गा

महारैली की अध्यक्षता करते हुए धर्म गुरू बंधन तिग्गा ने कहा कि महारैली का उद्देश्य सरना धर्म कोड हासिल करना है और यह मुहिम तबतक नही रूकेगा जबतक सरना धर्म की महिमा देश दुनिया में विश्व धर्म के रूप नही ले लेता. उन्होंने कहा कि पूर्ण विश्वास है कि हमारे जीवन  रहते ही सरना धर्म कोड भी मिलेगा और धर्मांतरण भी रूकेगा. उन्होंने महारैली में आह्वान किया कि समाज में इसी प्रकार की एकजुटता बनाये रखें.वर्ष 2024 से पहले केन्द्र सरकार जनगणना परिपत्र में सरना धर्म कोड शामिल नही करती है तो दिल्ली के रामलीला मैदान महारैली होगी.

कॉमन सिविल कोड और हिंदू राष्ट्र स्वीकार नहीं : डॉ करमा उरांव

शिक्षाविद डा करमा उरांव ने प्रस्ताव पारित कराते हुए कहा कि देश में 17 करोड़ आदिवासी है जो धर्मांतरित नही है. उन्हे प्राकृतिक धर्म सरना धर्म का पृथ्क कोड चाहिए ताकि अबतक जो आदिवासी जनसंख्या धर्मांतरण के सॉफ्ट टारगेट है उससे बचाया जा सके. करमा उरांव ने कॉमन सिविल कोड एवं हिन्दू राष्ट्रीय पर प्रहार करते हुए कहा कि यह मुहिम संविधान की मंद भावना के खिलाफ है जिसे भारत का आदिवासी समाज स्वीकार नही करेगा.

रांची में सरना धर्म कोड महारैली : ‍वक्ताओं ने कहा धर्म कोड हासिल करने तक आंदोलन जारी रहेगा

आदिवासियों पर पड़ रहा विपरीत प्रभाव : शिवा कच्छप

केन्द्रीय सरना संघर्ष समिति के प्रदेश अध्यक्ष शिवा कच्छप ने कहा कि सरना धर्म कोड नही होने से आदिवासियों की संख्या लगातार कम बतायी जा रही है. प्रकृतिपूजक आदिवासीयों को धर्म कोड से वंचित रखा गया है. राज्य में अब तक स्थानीय नियोजन नीति भी नहीं बनी जिससे हम तृतीय-चतृर्थ वर्ग की नौकरियों से वंचित है. आदिवासी-मूलवासियों की जमीन की रक्षा के लिए सीएनटी, एसपीटी एक्ट सख्ती से लागू कराने की जरूरत है

सरना धर्म कोड महारैली के माध्यम से संवैधानिक मसले एवं मांग उठाया गया जो निम्नलिखित है.

(1) सरना धर्म कोड –  जनगणना परिपत्र में हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई जैन बौद्ध अधिसूचित है वहीं अन्य धर्मों के लिए धर्म कॉलम अधिसूचित है, आदिवासी देश के प्रथम नागरिक/मालिक है किन्तु अबतक इनका धार्मिक पहचान नही दिया गया है.

सरना धर्म को जनगणना परिपत्र में पृथक कोड आवंटित हो. चुकि देश के सौ से अधिक जनजाति समुदाय की धार्मिक आस्था सरना धर्म है.

वर्ष 2011 की जनगणना में आवंटित अन्य धर्म कॉलम में 79.37 लाख लोगों ने अपना-अपना धर्म दर्ज किया है जिसमें देश के 29 राज्यों में 49.57 लाख (62.45 प्रतिशत ) लोगों ने सरना धर्म दर्ज किया जो जैन धर्म की संख्या 44.51 लाख से अधिक है.

मालूम हो कि झारखंड सरकार ने 11 नवम्बर 2020 को विधानसभा से विशेष सत्र में सरना धर्म पारित कर अनुशंसा केन्द्र सरकार को पृथक कोड के लिए भेजा है.

वहीं 17 फरवरी 2023 को पशिचम बंगाल सरकार ने सरना धर्म कोड का प्रस्ताव विधानसभा से पारित कर केन्द्र सरकार को भेजा है.

इसी प्रकार छत्तीसगढ़ और ओडिशा सरकार भी सरना धर्म कोड का प्रस्ताव केन्द्र को भेजने की तैयारी है.

(2) कॉमन सिविल कोड – केन्द्र सरकार की मुहिम कि कॉमन सिविल देश में लागू हो इसका जनजातीय समाज विरोध करता है. चूंकि देश में 700 जनजाति समाज है तथा उसके अलग अलग सामजिक सांस्कृतिक एवं धार्मिक अवस्था एवं परंपराएं है उसकी विविधता विशिष्टता अनुपाठन पर व्यापक प्रतिकूल असर पड़ेगा.

भारत अपने संवैधानिक स्वरूप में धर्म निरपेक्ष गणराज्य है वहां हिन्दू राज्य की कल्पना सर्वथा गलत है.

(3) पांचवीं अनुसूची- संविधान की धारा 244 के तहत देश के जिन राज्यों में अनुसूचित क्षेत्र है, वहां अबतक कारगर ढंग से जनजाति  परामर्श  दात्री समिति अपने संवैधानिक स्वरूप में कार्य नही कर रही है, ये दुर्भाग्यपूर्ण अवस्था है, अनुसूचित क्षेत्र वाले राज्यों में पेशा कानून भी अबतक कारगर ढंग से स्वायत्त शासन का रूप नही ले पाया है। जबकि यह कानून 24 सितम्बर 1996 को पारित हुआ है.

 (4) आदिवासियों की समाजिक धार्मिक सांस्कृतिक व्यवस्था की परिसंपत्तियों यथा पहनई,  डालाकतारी, महतोई, पइनभोरा, कोटीवार, नौकराना, सरना अखडा, जतरा, मसना, हड़गड़ी, देशवली, दरहा आदि को चिंहित कर सुरक्षित कर संवर्धन हेतु राज्य सरकार राशि आवंटित करें.

(5) आदिवासियों की जमीन पर बाहरियों का अवैध कब्ज़ा हो रहा है तथा सादा पट्टा पर अवैध तरीके से खरीद बिक्री हो रही है इसे अविलंब रोका जाए, जमीन संबंधी रिकार्ड पर ऑनलाईन छेडछाड की गई है, जिसके कारण विवाद बढ़ा गया है जिस पर सरकार गम्भीरता से कार्रवाई करे.

(6) आदिवासी महिला यदि गैर-आदिवासी से विवाह करती है तो उस महिला का आदिवासी स्टेटस एवं अधिकार समाप्त किया जाए.

(7) झारखंड में वन पट्टा कानून की लचर व्यवस्था है, अबतक 25% लोगों को भी वनधिकार कानून के तहत पट्टा नही मिला है, इस कानून का राज्य में अक्षरशः पालन हो.

(8) पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास की सरकार में गांव की उपयोग जमीनों को लैंड बैंक बनाकर अधिग्रहण किया है इससे जनजातीय समाज पर बुरा असर पड रहा है, इसलिए लैंड बैंक कानून को वापस लिए जाए.

(9) केन्द्रीय भूमि अधिग्रहण कानून 2013 में निहित सोशल इम्पैक्ट एशेमेंट (समाजिक प्रभाव आकलन/SIA) प्रावधान जिसको रघुवर दास की सरकार संशोधन करायी है.

इसे वापस लिया जाए और केन्द्रीय कानून का आरक्षण पालन किया जाए.

(10) मूल आदिवासियों का धर्मांतरण हिन्दू धर्म एवं ईसाई धर्म में धड़ल्ले से हो रहा है इसे रोकने का प्रवाधान राज्य सरकार करें.

(11)  कुरमी जाति को अनुसूचित जनजाति में संसूचित करने की मांग अनुचित है, चुकि मूल आदिवासी ही अनुसूचित जनजाति के रूप में अधिसूचित होने का अधिकार है.

(12) भारतीय संविधान की धारा 272.1A के तहत सरकार आदिम जनजातीय के लिए राज्य सरकार को राशि आवंटित करती है परंतु झारखंड में दुखद है कि 2021 से लेकर अबतक के वित्तीय वर्ष में जो राशि आई है  उसका उपयोग नहीं हुआ है.

ट्राइबल सब प्लान के लिए आवंटित राशियों का विचलन अन्य मदों में की जाती है इसे रोका जाए एवं आदिवासी हित में खर्च की जाए.

पूर्ववर्ती सरकारों ने ट्राइबल सब प्लान के पैसों का दुरूपयोग एवं बंदरबाट किया है इसकी जांच करवाया जाए.

(13) राज्य में अनुबंध पर हजारों नियुक्तियां हुई है जिसमें 80 प्रतिशत बाहरी है, नियुक्ति में आरक्षण रोस्टर का खुल्लम खुला उल्लंघन है, इनका नियमतिकरण रोकी जाए.

महारैली को नेपाल से आयें राम किशुन उरांव, बंगाल के भगवान दास मुण्डा बिरसा तिर्की, छत्तीसगढ़ के मिटकू उरांव, उड़ीसा के मनीलाल केरकेट्टा, बिहार के ललित उरांव, सहित झारखंड के

विद्यासागर केरकेट्टा, शिवा कच्छप नरायन उरांव, बलकू उरांव, मथुरा कांडिर, दुर्गवती ओडिया, सुनील हेमरोम,सोनोत मरांडी, रवि तिग्गा, संगम उरांव, अमर उरांव, रेणु उरांव, शिला उरांव, चिंतामणि उरांव, प्रेमनाथ मुण्डा, रमेश उरांव, रंथु उरांव, माधो कच्छप, सुरज खलखो, बुधवा उरांव, कमले उरांव, रायमुणी केसपोट्टा, सोनी कच्छप, अजय उरांव, विक्की धान, कुशल उरांव , चम्पा उरांव, शंकर बेदिया, तानसेन गाड़ी, प्रभात तिर्की, झरी लिण्डा, हेमंत गाडी, अजीत भुटकंवर,  विशाल तिग्गा, राजू तिग्गा, अर्जुन उरांव आदि ने भी सम्बोधित किया.

रैली में मुख्य रूप से अनिता उरांव, सती तिर्की, मंगल उरांव, महादेव उरांव, मीणा किस्पोट्टा, गुड्डी उरांव, शोभा तिर्की, सिम्पी कुजूर, गुड्डी उरांव, कुलदीप उरांव, झलकी तिर्की, नुरी तिर्की, सिटीओ उरांव, नीलम उरांव सहित अन्य उपस्थित थे.

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