डॉ बीपी केशरी ने सबसे पहले झारखंड का इतिहास लिखने का काम किया था

डॉ बीपी केशरी ने सबसे पहले झारखंड का इतिहास लिखने का काम किया था

91 वीं जयंती पर याद किए गए डॉ बीपी केशरी

रांची.

 जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा केन्द्र के नागपुरी विभाग में शनिवार को डॉ बीपी केशरी की 91 वीं जयंती पर संगोष्ठी का आयोजन किया गया. कार्यक्रम की शुरुआत डॉ बीपी केशरी के तस्वीर पर माल्यार्पण व पूष्प अर्पित कर किया गया.

सबसे पहले लिखा झारखंड का इतिहास

संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा केन्द्र के समन्वयक डॉ हरि उराँव ने केशरी जी के छात्र व सहयोगी के रूप में बिताये पलों को साझा किया. डॉ हरि उरांव ने कहा कि कि झारखंड की भाषा और संस्कृति को प्रगाढ़ बनाने के लिए केशरी जी ने पूरे जोर शोर से काम किया. केशरी जी ने सबसे पहले झारखंड का इतिहास लिखने का काम किया. केशरी जी झारखंड के इतिहासकार के रूप में भी जाने जाते हैं. उनका नजरिया एकदम अलग था. उन्होंने कहा कि केशरी जी का सोच बहुत उँचा था. अपने छात्र छात्राओं को वे अपने बराबर समझते थे. समन्वय के साथ भाषा, साहित्य और संस्कृति को मजबूती के साथ साथ दिशा देने का काम किया. उन्होंने कहा कि डॉ केशरी झारखंड ही नहीं बल्कि पूरे देश व दुनिया में झारखंडी संस्कृति, भाषा और साहित्य का प्रतिनिधित्व किया.

स्वप्नदर्शी और सत्य के पुजारी थे डॉ केशरी

मुख्य वक्ता नागपुरी विभाग के सहायक प्राध्यापिका डॉ सविता केशरी ने कहा कि केशरी जी स्वप्न दर्शी और सत्य के पुजारी थे. साहित्य के साथ साथ राजनीति में भी उन्होंने अपनी पैनी नजर रखीं.  झारखंडी समाज समाज को आयना दिखाने का काम किया. वे एक कुशल शिक्षाविद के साथ साथ आंदोलनकारी, साहित्यकार, पत्रकार, इतिहासकार और समाजसेवी थे. पुत्री होने के नाते उन्होंने अपने पिता के सम्पूर्ण जीवन व कार्यों को सविस्तार रखा.

पूरे समाज को साथ लेकर लेकर चलते थे

नागपुरी विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ उमेश नन्द तिवारी ने स्वागत करते हुए कहा कि केशरी जी पूरे समाज को एक साथ लेकर चलने वाले व्यक्ति थे.  वे जात पात की भावनाओं से उपर उठकर काम किया. साहित्यिक आंदोलन छेड़ा. झारखंड आंदोलन को इनके लेखनी से बल मिला. इनकी साहित्यिक आन्दोलन के कारण ही झारखंड को पूरी दुनिया में जाना गया. इनके नाम के बगैर झारखंड आंदोलन अधूरा होगा. उन्होंने कहा कि साहित्यिक आंदोलन के साथ साथ राजनीतिक आंदोलन में भी उनके योगदान को भुलाया नहीं जा सकता है. उन्होंने झारखंड आंदोलन को बौद्धिक माईलेज दिया. उन्होंने कहा कि झारखंड का सौभाग्य रहा कि हमारे बीच डॉ बीपी केशरी जैसा विराट व्यक्तित्व मिला. झारखंड को समग्र रूप से समझने व जानने वाले व्यक्ति थे.

आदोलनकारी भी थे केशरी जी

सहायक प्राध्यापक डॉ बीरेन्द्र कुमार महतो ने कहा कि केशरी जी सिर्फ साहित्यकार ही नहीं, बल्कि एक आन्दोलनकारी भी थे. विकट परिस्थिति में झारखंड आंदोलन को संभाला और गति प्रदान किया था. डॉ महतो ने डॉ केशरी के साथ बिताये पलों और कार्यो को विस्तार से बताया.

सहायक प्राध्यापक तारकेश्वर सिंह मुण्डा ने कहा कि  केशरी जी बहुत ही सरल स्वभाव के व्यक्ति थे. वे हमेशा विद्यार्थियों को पढ़ने और खूब लिखने के लिए प्रोत्साहित करते रहते थे.

सहायक प्राध्यापिका डॉ सरस्वती गागराई ने डॉ केशरी जी से एक शिक्षक के रूप में बिताये हुए पलों को विस्तार से रखा. उन्होंने कहा कि मैं उनके सानिध्य में शिक्षा ग्रहण कर अपने को धन्य मानती हूँ. चीजों को बहुत बारीकी के साथ समझाते व हल करते थे.

डॉ हेमलाल कुमार मेहता ने डॉ बीपी केशरी द्वारा टीआरएल विभाग के स्थापना से लेकर संवर्द्धन एवं संरक्षण के लिए चलाये गए मुहिम को विस्तार से बताया और कहा कि सचमुच डॉ बीपी केशरी झारखंड के एक महान विभूति थे, जिनकी कमी हमें आज खलती है.

धन्यवाद देते हुए नागपुरी विभाग के प्राध्यापक डॉ रीझू नायक ने कहा कि डॉ बी पी केशरी जी के व्यक्तित्व से प्रेरित होकर मैं भी शिक्षा के साथ साथ राजनीति में आया. समाज सेवा करने का प्रण लिया. केशरी जी के मार्गदर्शन में भाषा साहित्य और झारखंडी संस्कृति को मजबूत करने के लिए पूरे प्रदेश में एक मुहिम चलाया.

गोष्ठी का संचालन विक्की मिंज और धन्यवाद सहायक प्राध्यापिका डॉ रीझू  नायक ने की. बुद्धेश्वर बड़ाईक व चन्द्रिका कुमारी ने स्वागत गीत प्रस्तुत किया. विषय प्रवेश नागपुरी विभाग के आलोक कुमार मिश्रा ने किया.

इस मौके पर जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा केन्द्र के , डॉ किशोर सुरीन, करम सिंह मुण्डा, दिनेश कुमार दिनमणी, प्रेम बास्के, राजकुमार मुर्मू, डॉ बन्दे खलखो, डॉ हेमलाल कुमार मेहता, योगेश प्रजापति, नेहा भगत, संदीप कुमार महतो, विष्णु पद महतो, राजमोहन महतो, प्रवीण कुमार सिंह, सहला सरवर, पूनम कुमारी, सोनिका कुमारी, तनु कुमारी, प्रिया ठाकुर, दीपिका कुमारी, भवेश कुमार के अलावा जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा केन्द्र के शोधार्थी और नवो भाषा विभाग के छात्र छात्राएँ मौजूद थे.

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