कार्डिनल तेलेस्फोर पी टोप्पो नहीं रहे, राज्य में शोक की लहर

कार्डिनल तेलेस्फोर पी टोप्पो नहीं रहे, राज्य में शोक की लहर

रांची।

कैथोलिक कलीसिया के कार्डिनल तेलेस्फोर पी टोप्पो नहीं रहे। उन्होंने 4 अक्तूबर को दिन के 3 बजकर 45 मिनट पर मांडर स्थित कांस्टेंट लीवंस हॉस्पीटल में अंतिम सांसे ली। कार्डिनल काफी लंबे समय से बीमार चल रहे थें। फेफड़े में पानी भरने की वजह से उन्हें हॉस्पीटल में भर्ती कराया गया था। रांची महाधर्मप्रांत के आर्चबिशप फेलिक्स टोप्पो एसजे ने कार्डिनल के निधन की पुष्टि की है।

 कार्डिनल 84 वर्ष के थे। वे भारत के पहले आदिवासी कार्डिनल भी थे। उनके निधन से राज्य में शोक की लहर फैल गई है। आर्चबिशप और कार्डिनल होने के नाते उनका अंतिम संस्कार संभवत: संत मरिया महागिरजाघर रांची में ही होगा। छोटानागपुर के चर्च के विकास में उनका काफी योगदान था।

कार्डिनल के निधन पर लगातार शोक संदेश आ रहे हैं। आर्चडायसिस की ओर से जारी शोक संदेश में कहा गया है कि छोटानागपुर में चर्च के विकास के योगदान में उनकी भूमिका को हमेशा याद रखा जायेगा।  शोक संदेश में कहा गया है कि “भगवान उन्हें प्रभु के बगीचे में उसके काम के लिए शाश्वत पुरस्कार प्रदान करें। आइए हम प्रार्थना में एकजुट हों और प्रभु से अपने से संबंधित सभी लोगों और प्रियजनों को सांत्वना देने के लिए प्रार्थना करें। हे प्रभु, उस पर सतत प्रकाश चमकने दो। कार्डिनल तेलेस्फोर पी टोप्पो की आत्मा को शांति मिले।”

सीएनआई छोटानागपुर डायसिस के बिशप बीबी बास्के ने भी कार्डिनल तेलेस्फोर पी टोप्पो के निधन पर शोक व्यक्त किया है। उहोंने कहा कि कार्डिनल के निधन पर सिर्फ रोमन कलीसिया की ही नहीं बल्कि समस्त छोटानागपुर कलीसिया की क्षति हुई है।

 गुमला में हुआ था 1939 में हुआ था जन्म

कार्डिनल तेलेस्फोर पी टोप्पो का जन्म 15 अक्तूबर 1939 को गुमला के झाडगांव में हुआ था। उनकी प्रारभिक शिक्षा गांव के स्कूल से ही हुई। मैट्रिक की परीक्षा उन्होंने लीवंस बरवे ब्वायज सेकेंडरी स्कूल चैनपुर से मैट्रिक की परीक्षा पास की। फिर रांची के संत जेविसर्स कॉलेज में दाखिला लिया। स्नातक के बाद उन्होंने रोम के पोंटीफिकल उर्बानियन यूनिवर्सिटी में पढाई की। रांची विश्वविद्यालय से एमए की डिग्री भी हासिल की।

स्वीटजरलैंड में हुआ पुरोहिताभिषेक, 2003 में बने कार्डिनल

कार्डिनल का पुरोहिताभिषेक 3 मई 1969 को स्वीटजरलैंड में हुआ। तोरपा के संत जोसेफ उवि में सहायक शिक्षक के रूप में उन्होंने काम किया। वे वहां के प्रभारी प्रधानाध्यापक भी रहें। उन्होंने तोरपा में लीवंस वोकेशन सेंटर की स्थापना भी की।

वे कुछ समय तक आर्चबिशप पीयुष केरकेट्टा के सचिव भी रहें। 8 जून 1978 को उन्हे दुमका का बिशप चुना गया। 7 अगस्त 1985 को वे रांची महाधर्मप्रांत के आर्चबिशप बने। 25 अगस्त को उनका पदस्थापन हुआ। 22-23 अक्तूबर 2003 को उन्हे पोप जोन पॉल द्वितीय के द्वारा कार्डिनल बनाया गया था।

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