मेयर ने सरकार पर साधा निशाना, कहा, राज्य सरकार नहीं चाहती कि आदिवासी कोर्ट तक पहुंचे

RANCHI: भाजपा की राष्ट्रीय मंत्री सह रांची की मेयर डाॅ आशा लकड़ा ने शनिवार को झारखंड सरकार पर निशाना साढा। उन्होंने कहा कि आदिवासी बहुल राज्य झारखंड में राज्य सरकार ने ऐसी स्थिति उत्पन्न कर दी है कि भविष्य में आदिवासी कभी अदालत का मुंह न देख सकें। आदिवासी अपने खिलाफ हो रहे अत्याचार को बस सहन करता रहे। उनके पास पैसा की कमी होती हैं और अशिक्षित होने की वजह से काफी कम संख्या में अदालत तक पहुंचते हैं। कोर्ट फीस वृद्धि विधेयक ने ऐसी स्थिति उत्पन्न कर दी है कि भविष्य में आदिवासी समुदाय के लोग कोर्ट तक नहीं पहुंच पाएंगे। कोर्ट फीस में की गई वृद्धि के कारण सबसे अधिक जिला कोर्ट प्रभावित होंगे।

बिल्डर आदिवासियों की कब्जा रहे जमीन

कोर्ट फीस अधिक होने के कारण आदिवासी समुदाय के लोग कोर्ट में अपील नहीं कर पाएंगे। वर्तमान में बिल्डर आदिवासियों की जमीन पर कब्जा कर रहे हैं। ऐसे में पीड़ित आदिवासी न्याय के लिए किसके पास जाएगा। यदि कोर्ट ने संबंधित अपील को सुनवाई योग्य नहीं माना तो जमा की गई कोर्ट फीस भी यूं ही व्यर्थ हो जाएगी। उन्होंने राज्य सरकार से आग्रह किया है कि कोर्ट फीस में कई गई वृद्धि को पुनः संशोधित कर आदिवासियों के हित में किया जाए।

इन बिंदुओं पर दिलाया ध्यान

संपत्ति विवाद से संबंधित मामला फाइल करने में पहले 50 हजार रुपये लगते थे। अब अधिकतम तीन लाख रुपये तक की कोर्ट फीस लगेगी।

झारखंड सरकार ने कोर्ट फीस में 10 गुना से अधिक वृद्धि की है।

पहले जनहित याचिका दायर करने के लिए मात्र 250 रुपये खर्च करने पड़ते थे, अब जनहित याचिका के लिए एक हजार रुपये जमा करने होंगे।

कोर्ट फीस (झारखंड संशोधन अधिनियम) को 22 दिसम्बर 2021 को विधानसभा से पारित कराया गया था।

इस पर 11 फरवरी 2022 को राज्यपाल से स्वीकृति मिली थी

गजट प्रकाशित होने के बाद कोर्ट फीस वृद्धि को लेकर विरोध हो रहा है।

22 जुलाई 2022 को झारखंड स्टेट बार काउंसिल ने राजभवन को आवेदन देकर कोर्ट फीस में हुई वृद्धि को वापस लेने की मांग की थी।

झारखंड सरकार ने कोर्ट फीस अधिनियम-2021 में संशोधन कर स्टाम्प फीस में छह से लेकर दस गुना तक की वृद्धि की गई है।

यह विधेयक गरीबों पर आर्थिक बोझ बढ़ाने वाला और न्याय में बाधक है। इससे गरीब आदिवासी न्याय से दूर हो जाएंगे।

झारखंड में पिछले 13 वर्षों में (2009 से 2021) तक गैर कानूनी गतिविधियां अधिनियम की धाराओं के तहत 704 मामले दर्ज किए गए हैं।

52.3 प्रतिशत केस आदिवासियों पर दर्ज किए गए हैं, जबकि इसके मुकाबले 23.1 प्रतिशत ओबीसी और 6.7 प्रतिशत दलितों पर दर्ज हुए हैं।

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