जब भारतीय सेना ने मालदीव में चलाया था ऑपरेशन कैक्ट्स

जब भारतीय सेना ने मालदीव में चलाया था ऑपरेशन कैक्ट्स

रांची।

लक्षदीप बनाम मालदीव आज सोशल मीडिया पर सबसे ज्यादा ट्रेंड करने वाला विषय है। कहना मुहाल है कि यह सब प्रधानमंत्री के लक्षदीप दौरे के बाद से शुरू हुआ या फिर इसकी पृष्ठभूमि मालदीव के मौजूदा सत्ता के आने के बाद से ही बनने लगी थी। बहरहाल आज हम पड़ताल कर रहे हैं उस इतिहास की जो बहुत ज्यादा पुराना नहीं है, पर जिसे मालदीव को याद कराना बहुत जरूरी है। ताकि उसे पता चले कि भारत की अहमियत खुद उसके लिए क्या है।

साल था 1988। नवंबर महीने की शुरूआत ही हुई थी। तब मालदीव के राष्ट्रपति थे मौमुन अब्दुल गयूम। इस पूरे प्रसंग में जो शख्स विलेन के रूप में ऊभरा वह था अब्दुल्ला लुथुपी। लुथुपी मालदीव का एक व्यावसायी था जिसने लिट्टे (लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम ) के भाड़े के सैनिकों की सहायता से मालदीव का तख्ता पलटने की साजिश रची। दो नवंबर की रात तक भाड़े के जहाज और स्पीडबोट पर सवार भाड़े के सशस्त्र लोगों ने माले में सरकारी भवनों, रेडियो स्टेशन, एयरपोर्ट और बंदरगाह में  कब्जा कर लिया।

राष्ट्रपति गयूम को छिपना पड़ा। लेकिन वे सहायता के लिए संदेश भेजने में सफल रहे। यह संदेश, अमेरिका, भारत, ब्रिटेन सहित कई देशों को मिला। मालदीव का सबसे करीबी पड़ोसी होने के नाते भारत ने मालदीव की मदद के लिए सैनिको को भेजने का फैसला लिया। तब कांग्रेस की सरकार थी और प्रधानमंत्री थे राजीव गांधी।

जब भारतीय सेना ने मालदीव में चलाया था ऑपरेशन कैक्ट्स

मालदीव से सहायता की पुकार के महज नौ घंटे के अंदर ही भारत ने मालदीव की सहायता के लिए ऑपरेशन कैक्टस लॉंच कर दिया। विशाल आईएल 76 विमान से भारतीय सेना के पैराट्रूपर्स माले पहुंचे और उन्होंने एयरपोर्ट, बंदरगाह सहित महत्वपूर्ण सरकारी भवनों को अपने कब्जे में कर लिया। लेकिन सैनिकों को ज्यादा प्रतिरोध का सामना नहीं करना पड़ा क्योंकि जब विद्रोहियों पता चला कि भारतीय सेना आ रही है उन्होंने भागने में ही खैर समझी। लेकिन भागते समय वे मालदीव के कई लोगों को अपने साथ बंधक बनाकर ले गये। समुंदर में भारतीय नौसेना भी सतर्क थी।

जल्दी ही उसने पता लगा लिया कि भाड़े के सैनिक श्रीलंका की तरफ जा रहे हैं। नौसेना की कार्रवाई में बंधकों को छुड़ा लिया गया। कई विद्रोही मारे गये कुछ भागने में सफल रहे। कुछ बंधकों को विद्रोहियों ने मार दिया। पर मालदीव के राष्ट्रपति गयूम और उनकी कैबिनेट के मंत्री सुरिक्षत रहें। तख्ता पलट की कोशिशों को नाकाम कर दिया गया। ऑपरेशन कैक्टस भारतीय कूटनीति की सफलता और भारतीय सेना के पराक्रम की कहानी है।  उसके बाद से सालों तक या यूं कहे दशकों तक मालदीव से भारत के संबंध बहुत अच्छे रहे हैं। पर अब मालदीव के मौजूदा सरकार के रवैये की वजह से एक बार फिर से दोनो देशों के संबंधों में खटास आ गयी है।

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