हाईकोर्ट के निर्णय का स्वागत, दोषियों पर कार्रवाई हो : महासभा

मामला लातेहार के गारू में मुठभेड़ बताकर पुलिस की गोली से मारे गए ग्रामीण ब्रहमदेव सिंह का

हाईकोर्ट के निर्णय का स्वागत, दोषी पुलिस कर्मियों पर कार्रवाई हो : महासभा

रांची।

झारखंड हाईकोर्ट ने माओवादी के नाम पर मारे गए ब्रह्मदेव सिंह की पत्नी जीरामनी देवी को 5 लाख रूपए मुआवजा देने की बात कही है। मामला रिट पिटिशन (W.P.(Cr.)/402/2021) से जुड़ा है। साथ ही न्यायालय ने दोषी पुलिस पदाधिकारियों के विरूद्ध दंडात्मक कार्र्वाई करने का निर्देश दिया है। न्यायालय ने कहा है कि ब्रम्हदेव सिंह की हत्या के मामले की वरीय पुलिस पदाधिकारी द्वारा नए सिरे से जांच कर तीन महीने के अंदर रिपोर्ट कोर्ट को दी जाए।

गौरतलब है कि 2021 में लातेहार के गारू में पारंपरिक शिकार पर निकले ग्रामीणों पर पुलिस ने गोली चलाई थी। ग्रामीण हाथ उठाकर कहते रहें कि वे नक्सली नहीं है गोली न चलाएं पर पुलिसकर्मियों ने फिर भी गोली चलाई जिसमें ग्रामीण ब्रह्मदेव सिंह की मौत हो गई। इसे पुलिस ने नक्सलियों के साथ मुठभेड़ की घटना कहकर प्रचारित किया था। पुलिस ने घटना के बाद मृत ब्रह्मदेव सहित पांच ग्रामीणों के खिलाफ मामला दर्ज किया था।

घटना के बाद ब्रम्हदेव समेत पाँच ग्रामीणों पर दर्ज किए गए प्राथमिकी ( गारु थाना 24/2021 दिनांक 13/06/21 को भी राज्य पुलिस ने ‘सबूत न मिलने’ के आधार पर बंद कर दिया है। लेकिन साथ ही साथ पुलिस ने जीरामनी द्वारा दोषी सुरक्षा बलों के विरुद्ध दर्ज प्राथमिकी (गारू थाना 11/2022 दिनांक 5/05/2022) को भी ‘तथ्य की भूल’ बोलकर बंद कर दिया है। न्यायालय ने कहा है कि पुलिस ने यह माना है कि सुरक्षा बलों के गोली से ही निर्दोष ब्रम्हदेव की जान गयी। प्राथमिकी को बंद करना दर्शाता है कि दोषी को बचाने की कोशिश की जा रही है। इस आलोक में न्यायालय ने पुलिस द्वारा इस प्राथमिकी को बंद करने के रिपोर्ट को खरीज़ करते हुये वरीय पदाधिकारियों द्वारा निष्पक्ष जांच का निर्देश दिया।

 झारखंड जनाधिकार महासभा ने झारखंड हाईकोर्ट के इस निर्णय का स्वागत किया है। महासभा की ओर से यह भी कहा गया है कि जीरामनी को मिला यह न्याय अभी भी आंशिक है। महासभा ने झारखंड सरकार से निम्न मांगे की है:

न्यायालय के आदेश अनुसार तीन महीने के अंदर मामले की निष्पक्ष जांच कर ब्रम्हदेव सिंह की हत्या के लिए ज़िम्मेवार सुरक्षा बल के जवानों व पदाधिकारियों पर दंडात्मक कार्र्वाई की जाए. 

                न्यायालय द्वारा निर्देशित मुआवज़ा राशि के अलावा राज्य सरकार द्वारा जीरामनी देवी को कम-से-कम 5 लाख रुपए अतिरिक्त मुआवज़ा दिया जाए और उनके बेटे की परवरिश, शिक्षा व रोज़गार की पूरी जिम्मेवारी ली जाए.

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                स्थानीय पुलिस को स्पष्ट निदेश दिया जाए कि पीड़ितों द्वारा दोषियों, खास कर के पुलिस व प्रशासनिक पदाधिकारियों, पर प्राथमिकी दर्ज करने में किसी प्रकार की परेशानी न हो.

महासभा की ओर से कहा गया है कि इस मामले ने शोषित आदिवासियों के प्रति राज्य के रवैये व पुलिस व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न खड़े किए है। कुछ तथ्य:

सुरक्षा बल व पुलिस द्वारा शुरुआती दौर में इस मामले को नक्सलियों के साथ एक मुठभेड़ का जामा पहनाने की कोशिश की गयी. पुलिस द्वारा दर्ज प्राथमिकी में भी तथ्यों से विपरीत बातें दर्ज की गयी. जनता के दबाव व कानूनी हस्तक्षेप के बाद ही पुलिस ने सच्चाई को मानते हुये कोर्ट में एफ़िडेविट दर्ज किया कि यह मुठभेड़ नहीं थी एवं सुरक्षा बल के फ़ाइरिंग में गोली लग के निर्दोष ग्रामीण ब्रम्हदेव सिंह की मौत हुई। पुलिस ने इस घटनाक्रम में अपना स्टेटमेंट लगातार बदला। मीडिया में कुछ और कहा,  दर्ज की गयी प्राथमिकी में व न्यायालय में जमा किए गए एफ़िडेविट में जुदा बातें कही गई।

                जीरामनी देवी ने अपने पति की हत्या के लिए जिम्मेवार सुरक्षा बलों के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज करवाने के लिए 29 जून को गारू थाना में आवेदन दिया था. लगभग एक साल के जन संघर्ष व कानूनी लड़ाई के बाद ही पुलिस द्वारा प्राथमिकी (गारू थाना 11/2022 दिनांक 5 मई 2022) दर्ज की गयी.

                महासभा की एलिना होरो, लालमोहन खेरवार और सिराज ने कहा कि इस मामले ने फिर से दर्शाया है कि किस प्रकार निर्दोष आदिवासी फर्जी मामले/फर्जी मुठभेड़/राज्य दमन का शिकार होते हैं एवं उनके परिवार को न्याय मिलना कितना कठिन होता है। दोषी पुलिस व सुरक्षा बल के विरुद्ध महज़ एक प्राथमिकी दर्ज करवाना एक लंबा संघर्ष है।