
रिम्स में चारों ओर अराजकता का माहौल है। जिससे समझा जा सकता है कि रिम्स को देखने या इसको नियंत्रित करने वाला कोई भी नहीं है। हॉस्पिटल को दलालों ने अपने कब्जे में कर रखा है। डॉक्टर से लेकर कर्मचारी, स्टाफ, नर्स में कुछ लोगों को छोड़ दिया जाए तो सभी अपने काम के प्रति लापरवाह है। इसी से समझा जा सकता है कि रिम्स और यहां के कर्मचारियों पर प्रशासन का अपना कोई कंट्रोल ही नहीं है। 20 सालों के इतिहास में रिम्स की ऐसी स्थिति नहीं थी जितनी वर्तमान समय में है। ये बातें सांसद संजय सेठ के रिम्स प्रतिनिधि सह जीबी सदस्य राजकिशोर ने कही। उन्होंने कहा कि रिम्स में वर्तमान में मरीजों का इलाज सही ढंग से नहीं हो रहा है।
प्राइवेट लैब को फायदा पहुंचा रहे
उन्होंने कहा कि भर्ती मरीजों के कई तरह की जांच पैथोलॉजी, सीटी स्कैन, एमआरआई, जांच बंद है। जिसका फायदा प्राइवेट लैब वाले उठा रहे हैं। रिम्स कैंपस में ही दो-दो प्राइवेट एजेंसी चल रही है। उन्हें फायदा पहुंचाने के लिए रिम्स में षड्यंत्र कर मरीजों को वहां भेजा जा रहा है। इतना ही नहीं प्राइवेट लैब के दलाल भी हॉस्पिटल में बेखौफ घूम रहे हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह यहां के कुछ कर्मचारी है। कमीशन के चक्कर में दलालों को बुला रहे हैं।
वीआईपी मूवमेंट पर एक्टिव प्रशासन
जब कोई वीआईपी या मंत्री का विजिट होता है तो रिम्स प्रशासन होश–हवास में रहता है। बाकी के दिन अधिकारी अपने-अपने ऑफिस में कुंडली मार के सो जाते हैं। सभी प्रशासनिक अधिकारी सिर्फ और सिर्फ अपना समय काट रहे है। रिम्स की स्थिति को सुधारने को लेकर किसी के पास सोचने का भी टाइम नहीं है। अचानक से कोई घटना, दुर्घटना हो जाए या हाईकोर्ट किसी मामले में संज्ञान ले ले तो प्रबंधन की नींद खुलती है। इसके बाद अधिकारी कारणों की जांच कराई जा रही है और जांच के बाद उचित कार्रवाई की बात कह कर अपना इतिश्री कर लेते है। इसके बाद छोटे कर्मचारियों, सुरक्षाकर्मियों पर गाज गिरती है।
टेंडर का सालोंभर चलता है खेल
टेंडर का खेल यहां सालों भर चलता रहता है। टेंडर निकालो फिर रद्द कर दो ताकि पहले से काम कर रही एजेंसी ही काम करती रहे। इसी टेंडर के चक्कर में हॉस्पिटल में ना तो कागज है, न रूई, न बैटरी, हैंडवॉश, न सिरिंज, न रीएजेंट, न केमिकल। आपरेशन थिएटर में जरूरी चीजें नहीं होने से छोटे-मोटे ऑपरेशन के लिए इस्तेमाल हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि रिम्स जीबी की बैठक भी सिर्फ खानापूर्ति के लिए होती है। जिसमें बिल्डर, ठेकेदार के बिल पास किए जाते है। मरीजों और कर्मचारियों के हित की जो बातें होती है वह कागजों पर सिमट जाती है। वर्षों से काम कर रहे कर्मचारियों का समायोजन भी आज तक नहीं हो पाया। इसे लेकर माननीय हाईकोर्ट ने भी टिप्पणी की है।