
रांची :
प्रगतिशील-लोकतांत्रिक-धर्मनिरपेक्ष गठबंधन की हेमंत सरकार को तीन साल से भी ज़्यादा हो गए,मग़र आज भी झारखंड के अल्पसंख्यकों के मुद्दें जस के तस बरकरार है,जबकि हेमंत सरकार गठबंधन की सरकार ने आपने ही चुनावी घोषणा पत्र में अल्पसंख्यकों से जो वादें किए थे उसे भी सरकार भूल गई है. आज भी अल्पसंख्यकों की सुरक्षा, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार एवं अल्पसंख्यकों के संवैधानिक अधिकार संस्थाओं के रूप में बहाल नही है उदाहरण के तौर पर अल्पसंख्यक आयोग,वित्त निगम,वक़्फ़ बोर्ड,उर्दू-मदरसा-पंजाबी बोर्ड एवं अन्य को लिया जा सकता है. उक्त मुद्दों को अल्पसंख्यक समुदाय के गुरुद्वारा प्रबंधन समिति सह शिक्षाविद प्रोफेसर हरबिंदर बीर सिंह,राष्ट्रीय ईसाई समुदाय के अध्यक्ष एवं वरिष्ठ झारखंड आंदोलनकारी प्रभाकर तिर्की,अंजुमन इस्लामिया रांची के महासचिव डॉ तारिक़ हुसैन,सामाजिक कार्यकर्ता नदीम खान, झारखंड जैन समुदाय के अजय जैन ने रांची में आयोजित प्रेस वार्ता में उठाया. वक्ताओं ने संयुक्त वक्तव्य में कहा कि हेमंत सरकार में मॉब लिंचिंग विरोधी क़ानून नही बना और न ही सांप्रदायिक घटनाएं कम हुई है.
हेमंत सरकार एवं पूर्व की झारखंड सरकार को भी देखें तो अल्पसंख्यकों के ज़िंदा पर योजना में दिलचस्पी कम और उनके क़ब्रिस्तान एवं क़ब्रिस्तान की चारदीवारी पर ज़्यादा फ़ोकस हो जा रहा है.
केंद्र सरकार के साथ साथ झारखंड सरकार भी अल्पसंख्यकों एवं दलितों को दोयम दर्जे पर रखा जा रहा है,
तभी तो झारखंड के इस बजट सत्र में कोई ठोस प्रस्ताव अल्पसंख्यक एवं दलित पर नही है जो अभी तक हाशिए पर है अभी तक तो यही महसूस हो रहा है.
बल्कि हेमंत सरकार में बिन मांगी मुराद पर फ़ज़ीहत ही कराया जा रहा है ऐसे झारखंड विधानसभा के कुछ सत्रों को देखें तो पता यही चलता है कि कभी नामज़गह, भाषा,उर्दू स्कूल,फ़सादी साम्प्रदायिक तनाव जैसे वातावरण को सत्र के पूर्व उछाला जाता है और अल्पसंख्यकों के मुद्दें पर फ़ज़ीहत कर कभी तुष्टीकरण में हमें रुसवा किया जाता है.
झारखंड विधानसभा अल्पसंख्यकों के अस्तित्व को ही इग्नोर कर रही है. तभी तो हेमंत सरकार के तीन साल होने के बाद भी अल्पसंख्यकों को केवल वोट बैंक की राजनीति के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है..हेमंत सरकार एवं झारखंड विधानसभा से अपील करते है कि अल्पसंख्यक भी आपके अभिन्न विकास का अंग है उनके मुद्दों को हल किया जाए.