समान नागरिक संहिता के खिलाफ आदिवासी संगठन, राजभवन के समक्ष धरना

समान नागरिक संहिता के खिलाफ आदिवासी संगठन, राजभवन के समक्ष धरना

रांची.

आदिवासी समन्वय समिति झारखंड के तत्वावधान में पांच जुलाई को राजभवन के समक्ष एकदिवसीय धरना दिया गया. धरना के दौरान समान नागरिक संहिता को देश की विविधता और एकता के खिलाफ बताते हुए काला कानून कहा गया. इस दौरान समिति की ओर से राज्यपाल को सात सूत्री बिंदुओं पर आधारित ज्ञापन सौंपा गया जो इस तरह हैं.

  1. देश में 730 अनुसूचित जनजातियां हैं जो देश की कुल जनसंख्या का 8.6 प्रतिशत (लगभग10.4 करोड़) है. 2011 की जनगणना के अनुसार झारखंड में 32 (आदिम जनजातियों सहित)  अनुसूचित जनजाति है.  इन सबके अपने अपने रीति रिवाज, परंपराएं और प्रथागत कानून है जो उनके व्यक्तिगत कानूनों का आधार भी है. इसलिए वे विभिन्न संवैधानिक कानूनों के तहत संरक्षित है. ये सभी यूसीसी के आने से प्रभावित होंगे.
  2. आदिवासी प्रथागत कानून किसी विशिष्ट धर्म से उत्पन्न नहीं होते हैं, बल्कि वे प्राचीन काल से सामाजिक मानदंडों और प्रथाओं से संचालित होते हैं. यूसीसी उनके हितों को प्रभावित करेगा.
  3. हिंदू ,मुसलिम, ईसाई, पारसी, यहूदियों जैसे अन्य प्रमुख धर्मों की तरह आदिवासियों के प्रथागत कानूनों को संहिताबद्ध नहीं किया गया है. यूसीसी झारखंड की अनुसूचित जनजातियों के लिए अनावश्यक और अवांछनीय है.
  4. एसटी को उनके प्रथागत कानूनों के कारण हिंदू कानूनों से मुक्त रखा गया है. न्यायालयों ने भी आदिवासियों को रीति रिवाजों के आधार पर हिंदू कानूनों से अलग रखा है. अब प्रथागत कानूनों के अभाव में उन्हें भी हिंदू माना जायेगा और उ पर हिंदू कानून लागू होंगे. इससे उनकी पहचान खतरे में पडेगी.
  5. झारखंड की जनजातियां पितृसत्तात्मक है, इन्हें सीएनटी, एसपीटी एक्ट और विलकिंसन नियम से सुरक्षा मिली है यूसीसी सामाजिक संरचना को अस्थिर करेगा. इसका असर पेसा कानून पर भी पडेगा. पड़हा, मुंडा, मानकी, मांझी, परगनैत, ढोकलो सोहोर जैसी स्वशासन की व्यवस्था पर भी प्रतिकूल असर होगा.
  6. पांचवी अनुसूची के तहत राज्यपाल को अनुसूचित क्षेत्रों में लागू होनेवाले केंद्रीय या राज्य अधिनियमों में अपवाद और उपान्तरों के तहत संशोधन लाने का अधिकार दिया गया है. इसलिए अनुसूचित जनजातियों के हित में यूसीसी अनुचित है.
  7. एक बार जब यूसीसी कस्टम आधारित कानूनों पर हावी हो जाता है तो यह पांचवीं अनसूची में निहित अन्य प्रावधानों को प्रभावित करेगा जो अलग पहचान और स्वशासन पर आधारित है.

ज्ञापन के माध्यम से राज्यपाल से अनुरोध किया गया कि झारखंड राज्य की अनुसूचित जनजातियों को यूसीसी से बाहर रखा जाये. साथ ही आदिवासियों के रीति रिवाज और पारंपरिक संस्थाएं मजबूत हो इसके लिए भी पहल हो.

इस अवसर पर कई वक्ताओं ने यूसीसी को अनुचित बताते हुए इसे काला कानून बताया. वक्ताओं में गीताश्री उरांव, लक्ष्मी नारायण मुंडा, देवकुमार धान, प्रेमशाही मुंडा, प्रो रामचंद्र उरांव, कुंदरसी मुंडा सहित अन्य शामिल थे.

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