
रांची.
गोस्सनर कंपाउंड स्थित एचआरडीसी सभागार में विभिन्न जन संगठनों के प्रतिनिधियों तथा ग्राम सभा के पारंपरिक ग्राम प्रमुखों ने एक राज्य स्तरीय कार्यशाला में झारखंड सरकार के पंचायत राज विभाग द्वारा जारी झारखण्ड पेसा नियमावली के औपबंधिक प्रारूप का विश्लेषण किया. इस कार्यशाला में रांची, खूंटी, गुमला, सिमडेगा, लातेहार, लोहरदगा, पश्चिमी एवं पूर्वी सिंहभूम तथा सरायकेला-खरसावां जिले के प्रतिनिधि उपस्थित थे. इस कार्यशाला का आयोजन “आदिवासी स्वशासन अधिकार मंच ” के तत्वावधान में किया गया.
इस कार्यशाला में नियमावली के विभिन्न बिंदुओं पर गहन चर्चा की गयी. नियमावली के विश्लेषण के क्रम में यह बात उभर कर आयी कि प्रस्तावित नियमावली में कई विसंगतियां हैं जिनको दूर किया जाना जरूरी है. कार्यशाला में यह निर्णय लिया गया कि सभी जिलों, जन संगठनों एवं ग्राम सभाओं द्वारा इस विषय पर पंचायती राज विभाग को पत्र लिखा जाएगा. उपस्थित प्रतिनिधियों ने इस बात पर रोष भी व्यक्त किया कि विभाग ने नियमावली बनाने में दस वर्षों से ज्यादा का समय लगाया और जनता को एक छोटी सी विज्ञप्ति के माध्यम से मात्र एक माह का ही समय दिया.
अभी अधिकतर ग्राम-सभाओं को पता नहीं है कि उनके लिए नियमावली बन भी रही है या नहीं, जबकि होना यह चाहिए था कि प्रत्येक ग्राम सभा को इसकी आधिकारिक सूचना दी जाती. सभा ने यह निर्णय भी लिया कि यदि इस नियमावली को केन्द्रीय पेसा कानून, 1996 के अनुसार ठीक नहीं किया गया तो वे बहिष्कार करने हेतु विवश होंगे और सभी जिलों में इसके विरुद्ध जन आंदोलन शुरू किया जाएगा.
कार्यशाला के दौरान नियमावलियों की कई खामियों की पहचान की गयी. यह बात सामने आयी कि जिला स्तर की प्रशासनिक व्यवस्था के लिए कोई प्रयास नहीं किए गए हैं जबकि यह पेसा कानून की एक अपरिहार्य शर्त है. यह बात भी आयी कि ग्राम सभा को मिलने वाले कई अधिकारों को पंचायतों को हस्तांतरित करने की तिकड़म इस नियमावली में नजर आती है. प्रतिभागियों ने चर्चा के बाद यह निष्कर्ष भी निकाला कि ग्रामसभा के कार्य के लिए ढेर सारे समितियों की कोई आवश्यकता नहीं है बल्कि ग्रामसभा की एक कार्यकारिणी समिति द्वारा ही सभी कार्यों को किया जा सकता है.
विश्लेषण के क्रम में यह बात सामने आयी कि भू- अधिकार, बाजार प्रबंधन, संस्थानों के नियंत्रण, पारंपरिक नियमों की मान्यता, न्याय प्रशासन, जैसे कई बिंदुओं पर व्यापक सुधार जरूरी है. प्रतिभागियों ने यह भी पाया कि कई सारे प्रावधानों को दूसरे अधिनियमों पर टाल दिया गया है जबकि पेसा कानून के अनुसार दूसरे अधिनियमों को पेसा कानून के अनुरूप बनाया जाना है. बैठक में इस बात पर भी जोर दिया गया कि संविधान के अनुच्छेद 254 की व्यवस्था के अनुसार झारखण्ड पंचायत राज अधिनियम, 2001 और पेसा कानून,1996 के बीच अंतर होने की स्थिति में पेसा कानून, 1996 के प्रावधान ही मान्य होंगे.
इस प्रस्ताव को भी पारित किया गया कि नियमावली में जहां-जहां पंचायत राज अधिनियम, 2001 का जिक्र है वहां-वहां पेसा कानून,1996 का जिक्र होना चाहिए क्योंकि यह “झारखण्ड पेसा नियमावली” है. इस बात पर भी जोर दिया गया कि पेसा नियमावली के प्रावधानों के द्वारा सी एन टी एक्ट, एस पी टी एक्ट, विल्किंसन रूल, आदि को बल प्रदान किया जाना चाहिए.
राज्य की पेसा नियमावली में पेसा कानून 1996 के सभी बिंदुओं को समग्रता के साथ शामिल किया जाना चाहिए. कार्यशाला में बिनीत मुंडू, सुषमा बिरुली, सीरत कच्छप, एलीना होरो और राम चंद्र उरांव, दयामनी बारला, जेरोम जेराल्ड कुजूर, विजय गुड़िया, अलस्टेयर बोदरा, संजीव भगत, रोज खाखा आदि ने भाग लिया.