प्रवीण मुंडा
RANCHI :

तस्वीर में दिख रही नारंगी टाइलों और ऊंची सफेद दीवारों वाला यह किला पूर्वी यूरोप स्थित रोमानिया में आज भी सैलानियों के लिए आकर्षण का केंद्र है. रोमानिया के ट्रांसेलवेनिया क्षेत्र में कारपेथियन पहाड़ पर मौजूद इस किले पर सैलानियों की दिलचस्पी, इस किले के दर्दनाक इतिहास और एक उपन्यास की वजह से है.
दरअसल इस किले और ट्रांसेलवेनिया में कभी वलाद द टेप का शासन था. वलाद को काउंट ड्रैकुला के नाम से लोग ज्यादा जानते हैं. उसका जन्म रोमानिया में 1431 ई में और मृत्यु 1476 ई में हुई थी. तो इतिहास ऐसा है कि 1462 में उस्मानिया के सुल्तान मोहम्मद द्वितीय ने रोमानिया पर हमला किया. अपने देश और ईसाइयत को बचाने के लिए वलाद ने बहादुरी और उससे भी ज्यादा क्रूरता से मोहम्मद द्वितीय की शक्तिशाली सेना का सामना किया.

उसने दुश्मनों के सैनिकों को भाले की नोक पर पिरोकर उन भालों को जमीन पर गड़वा दिया था. जब दुश्मन के और सैनिक किले के नजदीक पहुंचे तो उन्हें अपने साथी भालों पर पिरोए हुए दिखे. इतिहासकार रादो फ्लोरेस्को और रेमंड मैकनली ने अपनी पुस्तक ड्रैकुला : प्रिंस ऑफ मेनी फेसेस में इस घटना का जिक्र किया है.
ब्रेम स्टोकर का उपन्यास ड्रैकुला
वलाद के इस वहशियाना तरीके से महमूद के सैनिकों की हिम्मत जवाब दे गई और उन्हे पीछे हटना पड़ा. वलाद से जुड़ी दंतकथाओं को लेकर इंग्लैंड के लेखक ब्रेम स्टोकर ने उपन्यास लिखा ड्रैकुला. यह उपन्यास 26 मई 1897 को प्रकाशित हुई थी. एक ऐसा (वैंपायर) पिशाच जो इंसानों का खून पीकर जिंदा रहता है. इस उपन्यास ने एक बार फिर से संसार को वलाद के खूनी कारनामों की याद दिला दी. इस उपन्यास पर आधारित ड्रैकुला नामक नरपिशाच को लेकर ह़ॉलीवुड में कई फिल्में बनी और ड्रैकुला संसार में हमेशा के लिए अमर हो गया.

रोमानिया के लिए वलाद हीरो है वैंपायर नहीं
उपन्यास में ड्रैकुला के किले के पास भेड़ियों का जिक्र मिलता है. और कारपेथियन पहाड़ों के उस जंगली क्षेत्र में आज भी बड़ी संख्या में भेड़िये मिलते हैं. पूरे संसार में ड्रैकुला को लोग नरपिशाच के रूप में जानते हैं. पर रोमानिया के लोगों के लिए वह आज भी हीरो है. एक ऐसा बहादुर और बेरहम इंसान जिसने अपने देश और धर्म की रक्षा के लिए अपने से कहीं अधिक शक्तिशाली दुश्मन का सामना किया और उसे भागने पर मजबूर कर दिया.
ड्रैकुला के देश से आए कृष्णभक्त
प्रसंगवश बता दूं कि कुछ साल पहले रांची में इस्कॉन संस्था की ओर से कुछ विदेशी साधु भगवदगीता का प्रचार करने आये थें. उनसे बातचीत करने के लिए मैंने एक पुस्तक उनसे खऱीद ली थी. उस विदेशी साधु का नाम अभी स्मृतियों में नहीं है पर बातचीत से पता लगा कि वे रोमानिया से थे. जब मैंने उनसे ड्रैकुला का जिक्र छेड़ा तो उनके चेहरे पर एक मुस्कान थिरक गई थी. मैंने उनके आगमन पर एक खबर भी बनाई थी जिसका शीर्षक था ड्रैकुला के देश से आए कृष्णभक्त.
रोमानिया में अभी भी लोग वैंपायर के अस्तित्व को मानते हैं
बहरहाल रोमानिया और पूर्वी यूरोप के कई देशों में कई लोग अभी भी मानते हैं कि पिशाच (वैंपायर) होते हैं. और ऐसी भी खबरें आई कि कुछ अंधविश्वासी लोगों ने कब्रों को खोदकर मृत इंसान का कलेजा आग में भूनकर खा लिया ताकि उस वैंपायर की ताकत खत्म हो जाए. डिस्कवरी चैनल पर प्रसारित एक्सपीडिशन अननोन का एक एपीसोड रोमानिया के वैंपायर और उससे जुड़ी भयावह कहानियों की पड़ताल पर ही आधारित था.